चाहत

‘चाहत’

” उड़ना नहीं चाहती हूं,
पर आज़ादी और विश्वास की उड़ान की चाहत है।
रेत के घरौंदे जैसे वादों की तमन्ना नहीं रखती,
पर एक आंखों में विश्वास समझ की चाहत है।
नन्हीं किरणें सूरज की जब खिलें,
ऐसे सवेरे की चाहत है।
वास्तविकता जहां सदा निकट रहे,
ऐसे कुछ क्षणों की चाहत है।
सच और सम्मान जिस सभ्य समाज का हिस्सा हो,
ऐसे माहौल की चाहत है।
स्त्री हूं जन्म से, कोमलता स्वभावगत है,
ऊंचाइयों को छूना चाहती हूं
पर बेरोक-टोक, निर्मल भावनात्मक नज़र की चाहत है।
चंद कुत्सित मानसिक भावों के रहते
पनप नहीं पा रही हूं,
पर एक स्वच्छ नयी निर्मल सोच की चाहत है
कभी धर्म तो कभी समाज की आड़ में दोहन हुए मेरा,
आज़ाद सोच के निर्झर आसमान की चाहत है।
चाहतों की सूची बहुत लंबी नहीं है,
पर समय का अभाव है
क्योंकि हवा के साथ समय बह रहा है
और उलझे हैं सब अपनी ‘मैं’ की उलझन में
यहीं सबके सर्वार्थ, स्वार्थरहित, सर्वसम्मत होने की चाहत है।
उड़ना नहीं चाहती,
पर निरंकुश सोच की उड़ान की चाहत है।।”

‘इन्दु तोमर’

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एक सोच, जिससे उम्मीद है समस्त नारी वर्ग सहमत होगा। शब्द मेरे हो सकते हैं पर आवाज़ हर स्त्री की है जो एक सभ्य समाज में अपने सांस्कृतिक, नैतिक मूल्यों के साथ आगे बढ़ने की आकांक्षा रखती है।
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