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चार दिन की ज़िंदगी

क्या क्या कर जाना हैबहुत लम्बा और कठिन है डगरमगर फिर भी बहुत दूर तक जाना है क्योँ रोते हो अपने दुखों परदेखो दुनिया में कहाँ कोई बे-गम है,घर से बाहर तो निकलोयहाँ सब बेदम है । नमक की लिए पोटलीजले की तलाश मेंसब घूम रहे है यहाँ,मरहम बन कर तुमकिसी का घाव को भरपढ़ना जारी रखें “चार दिन की ज़िंदगी”

मेरी मां

मां आप ममतामई ईश्वर की मूरत हैंअनोखी हैं आपसमाये हैं आपमें सब गुणमैं प्रतिमूर्ति हूं आपकीपर आप सी ना बन पायीवो रातभर मेरे दर्द से जागनामेरी परेशानी में मेरी ढाल बन जानाआज भी कोशिश करती हूं आपसा होनाहिम्मत देकर मुझे बहादुर बनानाहर बार गिरने पर कपड़े झाड़करमुझे फिर भागने के लिये तैयार करनामेरे हर गुणपढ़ना जारी रखें “मेरी मां”

आत्ममंथन

कभी शब्दों में तलाश न करना वजूद मेरा….दोस्तों,मैं उतना लिख बोल नहीं पाती, जितना महसूस करती हूँ!कभी कभी सच को सच और झूठ को झूठ कह देती हूं,फिर दूसरे ही पल सम्हल जाती हूं और मुस्कराती हूं,यहां कोई सच सुनना नहीं चाहता,सबकी अपनी झूठ सच की दुनिया है, स्वयं को समझाती हूं!एक चेहरे पर अनेकपढ़ना जारी रखें “आत्ममंथन”

मैं कविता

मैं कवितामैं अंजान हूं,मैं नादान हूं,और किसी की पहचान हूं,कलम द्वारा आईकुछ शब्दों की डाल हूं कभी रेंग-रेंग चले कलमकभी कभी दौड़ी जाए,कुछ शब्दों से बने डालऔर कुछ शब्दों से जाल बुना जाए तीन उंगली का सहारासच्चे दिल सोच द्वारा,कलम रखती है स्याहीशब्दों के द्वारा । पढ़ना-पढ़ाना-पढ़ाईस्याही के अक्षर ढाई,जीवन छिपा है इन्हीं शब्दों मेंकहतेपढ़ना जारी रखें “मैं कविता”

जीवन

वक्त का तकाज़ा था,काश रुक जाता ये एक पल,जब हमारी नज़र तुम पर ठहर गयी थी।धड़कन बेतहाशा दौड़ रही थी,आकांक्षाओं की चरम सीमा थी,मन का चंवर डोल रहा था,तन पर छायी थी महक मादकता की,बस, सांसें ही नहीं रुकीं ।फिर,चला दौर मोहब्बत का,शोर था चिड़ियों के चहचहाने का,मन मयूर के गाने का,इंतज़ार की रातों केपढ़ना जारी रखें “जीवन”