आत्ममंथन

कभी शब्दों में तलाश न करना वजूद मेरा….दोस्तों,
मैं उतना लिख बोल नहीं पाती, जितना महसूस करती हूँ!
कभी कभी सच को सच और झूठ को झूठ कह देती हूं,
फिर दूसरे ही पल सम्हल जाती हूं और मुस्कराती हूं,
यहां कोई सच सुनना नहीं चाहता,
सबकी अपनी झूठ सच की दुनिया है, स्वयं को समझाती हूं!
एक चेहरे पर अनेक चेहरे चढ़ाकर जीते हैं,
सबके अपने दर्द और दर्द-ए-दिल हैं,
आत्ममंथन करती हूं, एक नये दृढ़ विश्वास से भर जाती हूं!
हर बार कुछ नया सीख जाती हूं……दोस्तों,
उतना लिख बोल नहीं पाती, जितना महसूस करती हूं!

कुछ कहना था…..दोस्तों

मैं कविता

मैं कविता
मैं अंजान हूं,
मैं नादान हूं,
और किसी की पहचान हूं,
कलम द्वारा आई
कुछ शब्दों की डाल हूं

कभी रेंग-रेंग चले कलम
कभी कभी दौड़ी जाए,
कुछ शब्दों से बने डाल
और कुछ शब्दों से जाल बुना जाए

तीन उंगली का सहारा
सच्चे दिल सोच द्वारा,
कलम रखती है स्याही
शब्दों के द्वारा ।

पढ़ना-पढ़ाना-पढ़ाई
स्याही के अक्षर ढाई,
जीवन छिपा है इन्हीं शब्दों में
कहते रहे यही मेरे सांईं ।

मैं कविता,
मैं मिलती हूं
कुछ पन्नों
कुछ किताबों में,
कुछ स्याही के रंगों में,
जीवन का हिस्सा हूं
जीवन के रंगों में ।

बाल-लड़क-होश
जवानी का आधार
इन्हीं शब्दों से बंधा जीवन का तार,
विचार-भावना-अंतिम वर्ष
कहना चाहूं शब्द हजारों हजार ।

मैं कविता

जीवन

वक्त का तकाज़ा था,
काश रुक जाता ये एक पल,
जब हमारी नज़र तुम पर ठहर गयी थी।
धड़कन बेतहाशा दौड़ रही थी,
आकांक्षाओं की चरम सीमा थी,
मन का चंवर डोल रहा था,
तन पर छायी थी महक मादकता की,
बस, सांसें ही नहीं रुकीं ।
फिर,
चला दौर मोहब्बत का,
शोर था चिड़ियों के चहचहाने का,
मन मयूर के गाने का,
इंतज़ार की रातों के बीत जाने का,
आस और सांस के मिल जाने का,
ये दौर कुछ लम्बा था।
फिर ठहर गये पल,
वक्त चलता रहा,
लम्हों की खता सदियों
के भुगतने की बारी थी,
हम वही थे,
मौसम समां और सांसे भी वही थीं,
बदला क्या था ?
जो वक्त ठहरा जान पड़ता था,
धीरे-धीरे चल रही थी
जीवन की गति,
यादों के झरोखों में झांक कर,
बीती यादों के सहारे,
सांसे समेट कर,
फिर इंतज़ार कर रहे हैं,
वक्त के बीतकर,
रुक जाने का,
सुकून की तलाश में।।

‘इन्दु तोमर’

“आत्मविश्वास”

ये सफर यूं ही चले हंसते हंसते,
थाम कर कुछ हाथ, लेकर कुछ साथ,
ना संशय, ना अविश्वास,
लेकर हर पल नयी आस,
स्वयं को लेकर साथ,
स्वयं पर कर के विश्वास,
इस सफर को पूरा करना है,
आत्मविश्वास की लौ जला कर
उजाले की ओर जाना है,
अंतर्मन की सुनकर, सबको साथ लेकर,
एक नयी मंजिल को पाना है,
कदम थमेंगे जरूर, रुकेंगे नहीं,
हो सकता है सफर में,
हाथ और साथ बदल जाएं,
पर मंज़िल पर जो साथ ध्वजा देगा,
वहीं हमकदम, शिखर सम होगा,
ये सफर यूं ही चलेगा,
जब तक है सांस में सांस,
ना रुकेंगे, ना झुकेंगे
बुलंदी को करके सलाम
चलते चलेंगे इस सफर पर यूं ही हंसते-हंसते
थाम कर कुछ हाथ, लेकर कुछ हाथ।।

‘इन्दु तोमर’

जिंदगी

खिले तो गुलाब सी महकती है जिंदगी,
बुझे तो चिराग की ठंडी राख सी है जिंदगी,
हर कोई आधीन है अपनी इच्छाओं के,
जीवन‌ के रंगमंच पर नाच रहे हैं,
इच्छाओं को पूरा करने की अंधाधुंध दौड़ में,
चमकदार लिबासों में छिपा कर असलियत
झूठ के पीछे भाग कर बिता रहे हैं जिंदगी,
सितारों के आगे जहां और भी है,
बचपन से सुनते आए हैं कहानियों में,
उसी जहां की तलाश में जी रहे हैं जिंदगी,
कागज़ पर उकेरी हैं कुछ सुंदर तस्वीरें,
रंग-बिरंगी सजीव सी, कल्पना को साकार करतीं,
एक बेइंतेहा खूबसूरत सी जिंदगी की कल्पना,
क्यूंकि कल्पना में ही जी सकते हैं सपनों सी जिंदगी,
अपना-पराया, इच्छा-अनिच्छा के पलड़ों में झूलती,
हर कदम लड़खड़ाती नये सबक सिखाती है जिंदगी।।

इन्दु तोमर

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